Wednesday, August 14, 2013

आशाऐं

तारों की जिलमिल हुई
चन्दा की रोशनी में घुली
सपनों के समुंदर में
आशाओं की लेहरें बडीं

तूफानों में छुपा खुदको
पत्तों की सरसराहट बनी
खुशबुओं की तरह फैली समां में
फूलों की साजीश कोई

बंजर की बजरी बन उडी
घाघर में पानी सि छलक गई
सूरज की किरनों में लिपटे
देखो कहां चली मनचली

मन की तरंग की धुन बुने
नैनों का कजरा होटों की हंसी हुई
दिल के दरवाजे पे दस्तक करती
इन लेहरों में आशाऐं बडी बडी



Sunday, September 30, 2012



and some beautiful words...

"सर  उठाके  मैंने  तो  कितनी  ख्वाहिशें  की थी
 कितने ख़्वाब देखे थे, कितनी कोशिशें की थी
 जब तू रुबरु आया , नज़रें ना मिला पाया
 सर झुका के एक पल में , मैंने क्या नाहीं पाया"

 -Arziyan (Delhi 6)

Monday, September 24, 2012

कदम एक कदम

गिरते हैं फ़नक से
उठते हैं
संभलते हैं
चलते हैं
कदम एक कदम

पहोचेंगे मंजिल पे
बैठेंगे साहिल संग

बरसते हैं आँखों से
छुपते हैं
मिटते  हैं
मुस्कुराते हैं
भीगे अनभीगे मन

बेरंग रंगों को  
रंगीन कर लेगा जीवन

झुंझते हैं कल से
लड़खड़ाते हैं
थकते  हैं
जीतते हैं
अरमां दबंग जंग

सफ़र की राहें हों
अपने अफसानों में मगन

चल मेरे संग
तोड़ लायें तारे चंद
अपना सा बीहड़ जो लगे
मेहकालें मंद मंद 

जिंदगी के नाम
जाम करे ऐसी तरंग
बिन तारों के अकेली
रात करे टम टम

काली चादर भी दे
सतरंगी का भ्रम
जुगनुओं से बुनें हम
उम्मिदों की पतंग

एक कोना चाँद का
जिसपे हो मेरा ही रंग
एक टुकड़ा आसमान का
एक मुठ्ठी भुवन

एक भुला सा अधुरा सा वादा

एक भुला सा अधुरा सा वादा भू से है
ना जाने उसे ये भूलता क्यों नहीं
आसमान के पर परिंदे ये दिल हैं
ना जाने उड़ान भरता क्यों नहीं

तमन्नाओं का सागर छलकता इन आँखों से
डूबते तैरते किनारा मिलता क्यों नहीं
रूठे रूठे जो कल के पल हमसे हैं
फिसले अफसानों से संभलता कुछ नहीं

हाथों में रखी यादें अंगड़ाइयां तोड़ती हैं
मचलती धार जैसी इनकों अंशुमन मिलता क्यों नहीं
स्याही सि काली सि आँखें टकटकी लगाएं हैं
बरसों देंखें बरस को बरस बदलता क्यों नहीं

चुभती हुई सि जो कसक आँखों का रुख लेती है 
लब्ज बनते बनते अर्क अपना उसे मिलता क्यों नहीं 
समझना ना कि शिकायतों का कारवाँ है
साथ इतना गहरा है कि दर्द लगता ही नहीं

Friday, September 21, 2012

“There is a sacredness in tears. They are not the mark of weakness, but of power. They speak more eloquently than ten thousand tongues. They are messengers of overwhelming grief...and unspeakable love.”
Washington Irving

Friday, August 31, 2012

Wednesday, May 4, 2011

There is no better 'little pick me up' than compliments in hundreds telling you how amazing your work is. Its better than any comfort food. And on a 'blues' day a heaven sent gift I reckon! who ever says there is no God, well I say otherwise! :) :) :) Thank you!!